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पुण्यतिथि विशेष: वीरांगना ऊदा देवी पासी, 1857 की अमर शहीद

02 December 2025
पुण्यतिथि विशेष: वीरांगना ऊदा देवी पासी, 1857 की अमर शहीद
मुख्य बातें:
ऊदा देवी केवल एक योद्धा नहीं थीं, बल्कि वे दलित और स्त्री अस्मिता की वह प्रतीक थीं जिन्होंने 1857 के संग्राम में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध लखनऊ के सिकंदर बाग में अदम्य साहस और शौर्य का परिचय दिया. 16 नवंबर उनका शहीद दिवस था. इस अवसर देश उन्हें एक ‘स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और वीरांगना’ रूप में याद करता है.

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अनेक अमर शहीदों के बलिदान से रचा गया है. 1857 की क्रांति में जहां बहादुर शाह जफ़र, नाना साहब, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, बेगम हज़रत महल, मंगल पांडे जैसी विभूतियां इतिहास में दर्ज हैं. इन्हीं में से एक हैं- ऊदा देवी पासी, जिनके साहस, नेतृत्व और शौर्य की गाथा लोकस्मृतियों में जीवित है.

ऊदा देवी केवल योद्धा नहीं थीं, बल्कि वे दलित और स्त्री अस्मिता की वह प्रतीक थीं जिन्होंने 1857 के संग्राम में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध 16 नवंबर को लखनऊ के सिकंदर बाग में लड़ते हुए अदम्य साहस और शौर्य का परिचय दिया. उनके शहीद दिवस पर हम उन्हें एक ‘स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और वीरांगना’ रूप में याद कर सकते हैं.

इस क्रांति का केंद्र उत्तर भारत था, जहां अवध की राजधानी लखनऊ में नवाब वाजिद अली शाह के कलकत्ता प्रवास के बाद उनकी पत्नी बेगम हज़रत महल और उनके सहयोगियों ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध संग्राम का बिगुल फूंका. ऊदा देवी पासी बेगम हजरत महल के महिला सैन्य दस्ते की प्रमुख थी. 

ऊदा देवी का जन्म 30 जून को उत्तर प्रदेश के लखनऊ के निकट उजरियांव गांव में हुआ था. कुछ दस्तावेज़ उनके जन्म का वर्ष 1829 लिखते हैं, और कुछ 1830. वह पासी समुदाय से थीं जो उत्तर प्रदेश में दूसरी सबसे बड़ी अनुसूचित जाति है. वह माता-पिता की इकलौती संतान थीं. उनका विवाह मक्का पासी से हुआ था. मक्का पासी नवाब वाजिद अली की सेना में शामिल थे और 10 जून 1857 को लखनऊ के पास चिनहट में अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हो गए थे.

उनके पति की मृत्यु ने उन्हें और भी दृढ़ कर दिया. ऊदा देवी ने पति की मृत्यु का बदला लेने की प्रतिज्ञा ली. जिसका मौका उन्हें लखनऊ सिकंदर बाग में मिला.

इतिहासकार राजकुमार अपनी पुस्तक ‘आधुनिक पासी समाज का इतिहास’ में लिखते हैं…

‘बेगम हजरत महल के नेतृत्व में मौलवी अहमदुल्ला शाह तथा महिला पलटन की सेना नायिका ऊदा देवी चिनहट में हुए संघर्ष का निरीक्षण करने  के साथ गयी. इस युद्ध में शहीद सैनिकों को बेगम हजरत महल ने कफन डाला और घायलों की मरहम पट्टी की. इस रणभूमि में ऊदा देवी ने अपने शहीद पति को पहचान लिया तो फूट-फूट कर रोने लगी.

बेगम हजरत महल ने ऊदा देवी को गले लगाया और करुणामयी नम आंखों से समझाया कि ‘अब रोवो मत बस एक ही रास्ता है कि अंग्रेजों से जमकर आजादी के लिए संघर्ष करना’ वह एक शेर को मारा है,तो तुम सैकड़ों फिरंगनी को मारो जिससे स्वतंत्रता की लहर भी मजबूत होगी और अरमान भी पूरा हो जाए.’    

1857 की संग्राम और लखनऊ के सिकंदर बाग की लड़ाई

लखनऊ के सिकंदरबाग का युद्ध 1857 की क्रांति के सबसे भीषण संघर्षों में से एक माना जाता है. अंग्रेज़ों की सेना जब लखनऊ को पुनः अपने नियंत्रण में लेना चाहती थी, तब ऊदा देवी और उनकी महिला टुकड़ी ने वहां के मोर्चे की रक्षा का दायित्व लिया.

प्रोफेसर बद्री नारायण ने उत्तर भारत के सबाल्टर्न समुदाय पर अपने शोध में इस लड़ाई का उल्लेख किया है. वह अपनी पुस्तक ‘दलित वीरांगनाएं एवं मुक्ति की चाह’ में लिखते हैं कि

‘ईस्ट इंडिया कंपनी ने जनरल कैम्पवेल को कमांडर बनाकर अवध भेजा था. यह वही कैम्पवेल था जिसे लखनऊ जाने वाले रास्ते में अमेठी-बंथरा के पासी तीन बार हरा चुके थे. चौथी बार जब वह आगे बढ़ने में सफल रहा तो उसने महाराजा बिजली पासी के दुर्ग को एक सैनिक छावनी में बदल दिया. 10 नवंबर को कैम्पवेल इसी छावनी से दिलकुश पहुंचा.

योजना के अनुसार उसे लखनऊ के मोती महल में जनरल ओटरम और हेनरी हेवलाक से मिलना था. लेकिन उसकी फ़ौज बहादुर भारतीयों से इतनी डरी हुई थी कि उसने अपना रास्ता बदल दिया इस नए रास्ते पर ही ऊदा देवी और उनकी स्त्री सेना से उसका सामना हुआ.’

वह स्थान लखनऊ में सिकंदरबाग था, जहां ऊदा देवी और ब्रिटिश सैनिकों का सामना हुआ. सिकंदर बाग नवाब वाजिद अली शाह ने बनवया था. सिकंदर बाग में ऊदा देवी ने पेड़ पर चढ़कर निशाना साधा और कई ब्रिटिश सैनिकों को मार गिराए. अंत में गोली लगने के कारण वह खुद शहीद गई थी.

लखनऊ का सिकंदर बाग, 1858. फोटोग्राफर फेलिस बीटों द्वारा ली गई तस्वीर

प्रोफेसर बद्री नारायण ने लड़ाई का वर्णन इस प्रकार किया है: 

‘लखनऊ के सिकंदर बाग के बीचोबीच पीपल का एक बड़ा और घना पेड़ था. इसके नीचे मिट्टी के कई मटके रखे रहते थे, जिनमें ठंडा पानी भरा रहता था. जब लड़ाई की मार-काट खत्म हुई तो बहुत-से अंग्रेज सैनिक अपनी प्यास बुझाने और अपनी थकान मिटाने के लिए इस पेड़ के पास पहुंचे. उन्होंने देखा कि पेड़ के आस-पास उनकी 53वीं और 59वीं रेजिमेंट के बहुत-से सैनिक मरे पड़े थे. कैप्टन डाउसन को मृतकों के घाव देखकर यह समझने में देर न लगी कि उन पर किसी ऊंची जगह से गोलियां चलाई गई थीं. कैप्टन डाउसन पेड़ से दूर हट गया और अपने सहयोगी वैलेस से बोला कि हमें पता लगाना चाहिए कि क्या पेड़ पर कोई है. उसने कहा कि मरे हुए सैनिकों को देखकर ऐसा लगता था कि उन पर सामने से गोली नहीं चलाई गई थी बल्कि पेड़ के ऊपर से चलाई गई थी. वैलेस के पास एक भरी हुई बंदूक थी.

उसने बड़ी सतर्कता से पेड़ के आस-पास एक चक्कर लगाया और कुछ ही देर में पेड़ पर छिपे व्यक्ति को ढूंढ़ निकाला. उसने कैप्टन डाउसन को चुपके से इसकी सूचना दी और फिर अपनी बंदूक का मुंह ऊपर उठाकर निशाना लगाया. देखते-ही-देखते उस छिपे हुए व्यक्ति का शव जमीन पर आ गिरा. उस व्यक्ति ने लाल रंग की जैकेट और गुलाबी रंग की चुस्त पतलून पहन रखी थी. उसकी जैकेट हटाने पर पता चला कि वह कोई पुरुष न होकर स्त्री थी.

उसकी जेबों में पुराने मॉडल की दो पिस्तौलें थीं. एक भरी हुई और दूसरी खाली. उसकी जेबों में कुछ कारतूस भी थे, जो बड़ी होशियारी से बनाए गए थे. वैलेस ने दुख से अपना माथा ठोंकते हुए कहा कि अगर उसे पता होता कि वह एक स्त्री है तो उसे मारने से पहले वह हजार बार खुद मरना पसन्द करता. वह स्त्री कोई और नहीं बल्कि ऊदा देवी थी.’

लखनऊ का सिकंदर बाग, 1858. फोटोग्राफर फेलिस बीटों द्वारा ली गई तस्वीर.

ऊदा देवी के शौर्य, साहस और शहादत को अंग्रेज अधिकारियों और पत्रकारों ने भी लिखा.

राना सफ़वी ने एक लेख ‘1857 की वीरांगनाएं, जिन्हें भुला दिया गया’ में ब्रिटिश सार्जेंट फ़ॉर्ब्स मिशेल की पुस्तक ‘रेमिनिसेंसेज़ ऑफ द ग्रेट म्यूटिनी’ के हवाले से लिखा है कि वे पीपल के एक बड़े पेड़ के ऊपर बैठी थीं और कई अंग्रेज सैनिकों को मार गिराने के बाद शहीद हुई थीं.

समकालीन सामाजिक एवं राजनीतिक महत्व

औपनिवेशिक इतिहास लेखन ने लंबे समय तक ऊदा देवी जैसी नायिकाओं को अनदेखा किया. उनके नाम को मुख्यधारा के इतिहास में स्थान नहीं मिला. लेकिन लोककथाओं, जनगीतों और स्थानीय स्मृति में उनका स्थान आज भी जीवंत है. आज सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर बहुजन अस्मिता का प्रतीक बन चुकी है. भारत में विशेषत: उत्तर प्रदेश में आज भी उनके शौर्य की गाथाएं लोकगीतों के रूप में गाई जाती हैं.

‘कोई उनको हब्शी कहता, कोई कहता नीच अछूत,
अबला कोई उन्हें बतलाए, कोई कहे उन्हें मजबूत.
लखनऊ की धरती लाल हुई, जब पासिन ने बंदूक उठाई.
अंग्रेज सिपाही कांप उठे, जब उदादेवी ने गोली चलाई.’

समकालीन भारतीय राजनीति में ऊदा देवी का नाम सामाजिक न्याय और दलित चेतना के प्रतीक के रूप में पुनर्स्थापित हो रहा है. पासी समुदाय और व्यापक दलित आंदोलन उन्हें ‘वीरांगना ऊदा देवी’ के रूप में सम्मानित करता है.

उत्तर प्रदेश में 30 जून को उनकी जयंती और 16 नवंबर को  ‘ऊदा देवी शहीद दिवस’ मनाया जाता है. यह स्मरण केवल एक व्यक्ति की वीरता का नहीं, बल्कि एक समुदाय की ऐतिहासिक पहचान के पुनरुद्धार का प्रतीक है.

(प्रदीप कुमार इलाहाबाद के जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान में शोधार्थी हैं.)

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