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विचार

बिहार चुनाव नतीजे: विजयी दलों के साथ ज्ञानेश कुमार को मिल रही बधाई लोकतंत्र की दशा बताती है

02 December 2025
बिहार चुनाव नतीजे: विजयी दलों के साथ ज्ञानेश कुमार को मिल रही बधाई लोकतंत्र की दशा बताती है
मुख्य बातें:
पिछले दशक भर में चुनावों, यानी एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लेकर अविश्वास उस बिंदु तक पहुंच गया है, जहां देश के पास एक ऐसा मुख्य चुनाव आयुक्त तक नहीं है, जिसके रहते देश चुनावों की स्वतंत्रता व निष्पक्षता को लेकर आश्वस्त हो सके. (फोटो: पीटीआई)

बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों पर एक शब्द में टिप्पणी करनी हो तो कहना चाहिए अभूतपूर्व. ये सिर्फ इस लिहाज से अभूतपूर्व नहीं हैं कि बीस साल के ‘सुशासन’ के बावजूद इनमें कहीं कोई एंटी-इनकमबेंसी नजर नहीं आती और प्रो-इनकमबेंसी सागर की तरह लहराती दिखाई देती है, जिसका अर्थ है कि मतदाता सरकार के कामकाज से इस हद तक संतुष्ट थे कि उन्होंने उसके विकल्प पर किसी भी विचार की जरूरत ही नहीं समझी. (हालांकि उनकी इस ‘संतुष्टि’ में कितने पेंचोखम हैं या हो सकते हैं, जानना या याद करना हो तो ‘द वायर हिंदी’ में 2024 में 29 नवंबर को दूसरे संदर्भ में ‘क्या मतदाता सरकारों से संतुष्ट रहने लगे हैं‘ शीर्षक से प्रकाशित टिप्पणी पर एक नजर डाल लेनी चाहिए.)

लोकतांत्रिक मूल्यहीनता की संतान

ये नतीजे इस मायने में भी अभूतपूर्व हैं कि इस देश के अब तक के लोकतांत्रिक इतिहास में ऐसा अक्सर नहीं होता जब किसी चुनाव में सत्तारूढ़ गठबंधन की जीत के लिए प्रतिद्वंद्वी दलों के नेताओं व प्रवक्ताओं द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त को इस तरह ‘बधाइयां’ दी जा रही हैं, जैसे इसका सारा श्रेय उन्हीं को जाता हो.

ये रोष में दी जा रही हों, क्षोभ में या हताशा में, इनसे इतना तो पता चलता ही है कि बधाइयां देने वालों को इन नतीजों में कितना गहरा अविश्वास है. ऐसा अविश्वास कभी जम्मू कश्मीर या असम के बहुत कठिन परिस्थितियों में कराए गए चुनाव नतीजों में भी शायद ही देखा गया हो. इसलिए इन नतीजों की बाबत यह नहीं कहा जा सकता कि चुनावों में हार-जीत तो होती ही रहती है या जो जीता, वही सिकंदर.

कहने की जरूरत नहीं कि यह अविश्वास लोकतांत्रिक मूल्यहीनता बरतकर जनादेश को बरबस छीन लेने और जनादेश ही न रहने देने की उस ‘परंपरा’ की उपज है, पिछले दशक भर से ज्यादा की अवधि में जिसे पालने-पोसने में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी व उसके ‘महानायक’ कुछ भी उठा नहीं रख रहे. अब तो उन्होंने उस बिंदु तक पहुंचा दिया है, जहां देश के पास एक ऐसा मुख्य चुनाव आयुक्त तक नहीं है, जिसके रहते देश चुनावों की स्वतंत्रता व निष्पक्षता को लेकर उस सीमा तक आश्वस्त हो सके, जिसकी बाबत कहा जाता है कि उनको निष्पक्ष होना ही नहीं दिखना भी चाहिए.

ऐसी आश्वस्ति होती तो देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे यह नहीं कहते कि ये नतीजे महज वोट चोरी की साज़िश को प्रमाणित करते हैं. लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के यह कहने की नौबत भी तब नहीं आती कि वे एक ऐसा चुनाव हारे हैं, जो शुरू से ही निष्पक्ष नहीं था.

इस क्रम में आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह की यह बात भी जोड़ दें कि उन्होंने तो महीनों पहले ही कह दिया था कि इस चुनाव को हाईजैक कर लिया गया है, तो ठीक से समझा जा सकता है कि इस चुनाव में जो जीत-हार हुई है, उसका मतलब क्या है.

खासकर, जब दक्षिणपंथी माने जाने वाले वरिष्ठ पत्रकार हरिशंकर व्यास तक को नहीं लग रहा कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की इस जीत से लोकतंत्र के तो छोड़िए, उसके स्वयं के भी किन्हीं उदात्त गुणों व मूल्यों की प्रतिष्ठा हुई है.

कैसा कोड आफ कंडक्ट?

निस्संदेह, ऐसा इसलिए है कि नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा नियुक्त (हां, नियुक्ति की यह शक्ति पाने के लिए इस सरकार ने बाकायदा कानून बनाया) मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार कहते भले रहे हों कि चुनाव आयोग की निगाह में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों समकक्ष हैं, इस चुनाव की समूची प्रक्रिया में वे अंपायर से ज्यादा खिलाड़ी की तरह ही पेश आते रहे हैं.

ये चुनाव कराने से पहले उन्होंने अचानक बेहद हड़बड़ी में किसी तानाशाह की तरह राज्य में मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण अभियान शुरू करा दिया और यह भी ध्यान रखना गवारा नहीं किया कि वहां बाढ़ का मौसम चल रहा है. विपक्ष की इससे जुड़ी चिंताओं को तो उन्होंने कभी औपचारिक तौर पर भी संबोधित नहीं किया. यहां तक कि मामला सर्वोच्च न्यायालय में ले जाया गया तो भी उन्होंने अपना अड़ियल रवैया नहीं ही छोड़ा. भले ही उसे लेकर न्यायालय को कई बार कड़ा रुख अख्तियार करना पड़ा.

विपक्ष का दुर्भाग्य कि देश की सबसे बड़ी अदालत भी उसे यथासमय समुचित इंसाफ नहीं दे पाई और जिस गहन पुनरीक्षण को लेकर उसने उसका दरवाजा खटखटाया था, उसके सिलसिले में उसके द्वारा उठाए गए किसी भी सवाल का सम्यक जवाब दिए बिना पुनरीक्षित मतदाता सूची के आधार पर, आप सांसद संजय सिंह के अनुसार जिसे बनाने में अस्सी लाख वोटों की चोरी हुई, चुनाव संपन्न कराकर नतीजे घोषित कर दिए गए और नई सरकार बनाने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई.

लेकिन ‘तारीफ’ करनी होगी सत्ता पक्ष की कि वह चुनाव आयोग द्वारा की गई इस ‘मदद’ पर ही निर्भर होकर हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठ गया. शायद वह इतने से ही अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नहीं हो पा रहा था. इसलिए उसने बेरोजगारों, बुजुर्गों और महिलाओं के बैंक खातों में नकदी भेजने, सीधे-सीधे कहें तो उनके वोट खरीदने की ‘योजनाओं’ की कुल धनराशि तीस हजार करोड़ रुपयों तक पहुंचा दी.

जैसा कि बहुत ‘स्वाभाविक’ था, उसके शुभचिंतक चुनाव आयोग को इसमें कुछ भी आपत्तिजनक या अलोकतांत्रिक नहीं लगा. न ही सारे प्रतिद्वंद्वियों को लेवल प्लेइंग फील्ड उपलब्ध कराने की अपनी जिम्मेदारी याद आई.

चुनाव विश्लेषक रहे स्वराज अभियान के संयोजक योगेंद्र यादव ने इसे लेकर बीबीसी से एक बातचीत में ठीक ही कहा, ‘मैं आपको दावे से कह सकता हूं कि अगर किसी विपक्षी पार्टी की सत्ता वाले राज्य ने ऐसा किया होता तो चुनाव आयोग रातोंरात खड़ा हो जाता. वो नियम बनाता और कहता कि ये स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के ख़िलाफ़ है. पर बिहार में यह सब मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट लागू होने के बाद तक किया गया.’

अब भी गफलत में!

दूसरे पहलू पर जाकर यह देखें कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा से एक दशक से ज्यादा के साबके के बावजूद अपवादों को छोड़कर ज्यादातर विपक्षी दल उससे मात ही क्यों खाते आ रहे हैं तो सबसे पहले जो बात सामने आती है, वह यह कि विपक्ष अब तक खुद को उनकी भाजपा का नीतिगत विपक्ष साबित करने में विफल रहा है.

उसे हराने के परंपरागत प्रयत्नों के बार-बार विफल होने के बावजूद वह उससे पार पाने की कोई नई राजनीतिक रणनीति भी नहीं ही ढूंढ़ पाया है. और तो और, विपक्षी एकता की समस्याओं का ऐसा निवारण भी नहीं कर पाया है, जिससे नाजुक वक्त में अपने ही शिविर में फ्रेंडली फाइट की नौबत न आए.

चूंकि विपक्ष के ज्यादातर दल कभी न कभी कहीं न कहीं सत्ता में रह चुके हैं और उसका ‘सुख’ भोगते हुए उन्होंने भी कोई उच्च लोकतांत्रिक आदर्श नहीं ही उपस्थित किया था, इसलिए भाजपा का उछाला यह एक सवाल ही उनकी बोलती बंद कर देता है कि अपनी बारी पर उन्होंने क्या किया था?

विडंबना यह कि इस सवाल के आगे किए जाने पर वे भाजपा से यह भी नहीं पूछ पाते कि उन्होंने अपनी बारी पर कोई गड़बड़ी की थी, तो मतदाताओं ने उन्हें बेदखल कर नई सरकार उस गड़बड़ी को दूर करने के लिए चुनी थी या उसकी आड़ लेकर उसे दोहराते जाने के लिए?

प्रियंका गांधी वाड्रा ने जरूर पिछले लोकसभा चुनाव में और बाद में सांसद बनने पर लोकसभा में भाजपा द्वारा बार-बार कांग्रेस को उसके सत्ता वाले दिनों के लिए कठघरे में खड़ी किए जाने पर कहा था कि अब इस तरह के आरोप एक्सपायर हो चुके हैं और नए सत्ताधीशों को अपने ग्यारह सालों के किए धरे का हिसाब देना चाहिए. लेकिन विपक्ष के दूसरे नेताओं को अभी भी ऐसे सवालों के समक्ष निरुत्तर ही देखा जाता है.

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह विपक्ष को लेकर एक और पते की बात कहते हैं. यह कि विपक्ष अभी भी भाजपा को लेकर गलतफहमी में है. उसे लगता है कि जब भाजपा बदनाम हो जाएगी तो जनता खुद ब खुद उसके खिलाफ उठ खड़ी होगी और विपक्ष मौका दे देगी.

लेकिन बकौल शीतल पी. सिंह, ‘विपक्ष को नहीं पता कि ये (भाजपा के) कौन लोग हैं और क्या-क्या कर सकते हैं. उसे समझना चाहिए कि जो महात्मा गांधी की हत्या से शुरू होते हैं, अंग्रेजों की दलाली से शुरू होते हैं और खुद द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत देकर दूसरे पर थोप देते हैं, साथ ही दोष के लिए लाशें, मुर्दे, अतीत और इतिहास वगैरह ढूंढते हैं , उनसे उसका संघर्ष है. उनसे, जिन्होंने मीडिया तक को जनता का शत्रु बनाकर विपक्ष को काटने, डराने, धमकाने, उस पर भौंकने व उसका पीछा करने के लिए तैनात कर दिया है. वे सत्ता के कितने तरह के दुरुपयोग कर सकते हैं, विपक्ष की उम्मीद से बाहर है.’

सिंह का निष्कर्ष है कि अगर विपक्ष इतना लापरवाह है तो वह देश के लोकतंत्र का रक्षक नहीं है और लोकतांत्रिक नागरिकों का नहीं, अपने स्वार्थों का नेतृत्व करता है.

कोई उनके इस निष्कर्ष से सहमत हो या नहीं, यह सवाल अपनी जगह है कि क्या विपक्ष का काम वोट चोरी या कि सत्ता पक्ष की दूसरी अनैतिकताओं व भ्रष्टाचारों (और भ्रष्टाचारों पर भी भारी कदाचारों) की पोल खोलने और उसके साथ चुनाव आयोग को भी निर्वसन करने भर से पूरा हो जाता है?

अगर नहीं तो वह इसको रोकने और देश को विकल्पहीन होने से रोकने के प्रयत्नों को लेकर ठीक से गंभीर क्यों नहीं होता? इसके खिलाफ जनमत बनाने या जन आंदोलन खड़े करने की दिशा में क्यों नहीं बढ़ता?

दस हजार में दसवीं बार ताज!

साफ कहें तो विपक्ष का खुद को इस सवाल के सामने करना इसलिए भी जरूरी है कि बिहार के इस चुनाव में उस पर चुनाव प्रणाली के इस अनर्थ का कहर भी टूटा है कि भाजपा से ज्यादा वोट पाने के बावजूद राजद को भाजपा की एक तिहाई सीटें भी नहीं मिली हैं, जबकि कांग्रेस के आधे से कुछ ही लाख ज्यादा वोट पाने के बावजूद लोजपा (रामविलास पासवान) ने उसकी तीन गुनी से ज्यादा सीटें प्राप्त कर ली हैं.

यों, विपक्षी गठबंधन को इतने मत मिलने का विपक्ष के लिए एक शुभ संदेश भी है. यहकि वोट चोरी और चुनाव आयोग के पक्षपात समेत मुकाबले की तमाम विषमताओं के बावजूद उसकी जनता ने उसे कतई खारिज नहीं किया है.

अफसोस की बात है कि इस सबके बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सिर्फ यह दिखाई दे रहा है कि बिहार की जनता ने गर्दा उड़ा दिया है. काश, वे समझते कि यह गर्दा इसी तरह हमारे लोकतंत्र के फेफड़ों में घुसकर उसकी सांसें फुलाता रहा तो देश के तौर पर हम एक दिन ऐसे खड्ड में जा गिरेंगे, जिससे निकलना बहुत मुश्किल हो जाएगा.

मीडिया पर तमाम शिकंजे के बावजूद एक अखबार में छपी यह सुर्खी इस बाबत बहुत कुछ कह देती है: ‘दस हजार में दसवीं बार ताज!’ अगर सरकारें इस तरह मतदाताओं से अपने ताज के लिए सौदा करेंगी और मतदाता इतनी बड़ी संख्या में उसमें शामिल होंगे तो…?

यह सोचना भी, कम से कम लोकतंत्र के शुभचिंतकों को, सिहराकर रख देता है. क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं का, वे महिलाएं हों या पुरुष, सरकार द्वारा दी गई रिश्वत स्वीकार कर उसे दंडित के बजाय पुरस्कृत कर देना एक दिन हमें हमारे बचे-खुचे लोकतंत्र से भी वंचित करके रख देगा. क्योंकि इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं का लोकतंत्र के खात्मे के लिए इस्तेमाल निर्बाध हो जाएगा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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